सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने वाराणसी में गंगा नदी में चिकन बिरयानी खाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए 14 मुस्लिम युवाओं के मामले पर गंभीर चिंता जताई है। नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में जस्टिस जीपी सिंह के चौथे मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए उन्होंने कहा कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है और युवाओं को ऐसे आरोपों में करीब तीन महीने तक जेल में रखना चिंता का विषय है।
‘चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं’
जस्टिस भुइयां ने कहा, “मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध नहीं हो सकता। उन्हें इसी वजह से गिरफ्तार किया गया और करीब तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा।”
क्या है वाराणसी का मामला?
मार्च 2026 में रमजान के दौरान वाराणसी पुलिस ने 14 मुस्लिम युवाओं को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 298 और 299 समेत अन्य प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया था। शिकायत के अनुसार, युवाओं पर गंगा नदी में नाव की सवारी के दौरान चिकन बिरयानी खाने और कथित तौर पर मांस की हड्डियां व बचा हुआ खाना नदी में फेंकने का आरोप था।
आरोपों में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, धार्मिक आधार पर दुश्मनी बढ़ाने, सार्वजनिक उपद्रव और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन जैसी धाराएं शामिल थीं।
‘असहमति लोकतंत्र का सार’
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने लोकतंत्र में शांतिपूर्ण असहमति और विरोध के अधिकार को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अपनी राय व्यक्त करना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता है।
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आजकल सामान्य गतिविधियों और शांतिपूर्ण विरोध को भी आपराधिक कानून के नजरिए से देखा जा रहा है। उनके मुताबिक, बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं।
छात्रों और एक्टिविस्ट्स के साथ व्यवहार पर भी चिंता
सुप्रीम कोर्ट के जज ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं और छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ होने वाले व्यवहार पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जो लोग जायज चिंताएं उठाते हैं, उनके साथ कई बार ऐसे व्यवहार किया जाता है जैसे उन्होंने कोई गंभीर अपराध कर दिया हो।
उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, उन्हें लंबे समय तक जमानत नहीं मिलती और कई बार शिक्षण संस्थानों से निलंबन का भी सामना करना पड़ता है।
जमानत की शर्तों पर उठाए सवाल
जस्टिस भुइयां ने अदालतों द्वारा जमानत के दौरान लगाई जाने वाली सख्त शर्तों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अदालतें जमानत देती हैं, लेकिन कई बार इसमें देरी होती है। वहीं, जमानत की पाबंदी वाली शर्तें नागरिकों के असहमति जताने के अधिकार को प्रभावित कर सकती हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसे प्रतिबंधात्मक आदेशों के जरिए अदालतें अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को असहमति व्यक्त करने से रोक रही हैं?
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी ने एक बार फिर नागरिक स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और आपराधिक कानून के इस्तेमाल को लेकर बहस छेड़ दी है।
