नेपाल में बार-बार तबाही क्यों मचाती है बाढ़ और भूस्खलन? समझिए इसके पीछे की वजह

नेपाल में भीषण बाढ़ से तबाही, तिब्बत के हिमालयी क्षेत्र पर नजर

नेपाल में एक बार फिर अचानक आई भीषण बाढ़ ने कई इलाकों में भारी तबाही मचा दी है। बुधवार सुबह रसुवा क्षेत्र की भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में अचानक जलस्तर बढ़ने से रसुवा के अलावा नुवाकोट, धादिंग, गोरखा और चितवन समेत कई जिले प्रभावित हुए। बाढ़ की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ स्थानों पर नदी का जलस्तर सामान्य से करीब 15 से 20 मीटर तक ऊपर दिखाई दिया।

इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में पानी अचानक आया कहां से? नेपाली अधिकारियों और विशेषज्ञों का शुरुआती आकलन है कि बाढ़ का स्रोत नेपाल की बजाय तिब्बत की ओर हो सकता है। हालांकि, इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन पर शक

नेपाल-चीन सीमा का हिमालयी इलाका बेहद संवेदनशील माना जाता है। तिब्बती क्षेत्र में बड़ी संख्या में ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इन झीलों में ग्लेशियर का पानी लगातार जमा होता रहता है। यदि पानी का दबाव बढ़ जाए, झील में हिमस्खलन हो या प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ जाए, तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है।

इसी तरह लगातार बारिश और भूकंपीय गतिविधियां भी इन झीलों की स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में आने वाली बाढ़ अपने साथ पत्थर, मिट्टी और मलबा भी बहाकर निचले इलाकों तक ले आती है, जिससे नुकसान कई गुना बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों ने बताया- अभी निष्कर्ष जल्दबाजी होगा

नेपाल के नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के कार्यकारी प्रमुख धर्मराज उप्रेती के मुताबिक, पिछले अनुभवों को देखते हुए ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान और वहां हो रहे बदलाव को इस तरह की घटनाओं से जोड़कर देखा जा सकता है।

हालांकि, मौसम विभाग की प्रवक्ता विभूति पोखरेल ने किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराने से इनकार किया है। उनका कहना है कि घटना की वास्तविक वजह का पता लगाने के लिए अभी अध्ययन किया जा रहा है और फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

आपदा विशेषज्ञ बसंत अधिकारी के अनुसार, घटना के स्वरूप से हिमस्खलन की संभावना दिखाई देती है। उनका कहना है कि यदि कहीं पानी का प्रवाह अभी भी अवरुद्ध है तो खतरा पूरी तरह टला नहीं माना जा सकता। इसकी सही जानकारी सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण के बाद ही सामने आएगी।

नेपाल के लिए क्यों बढ़ रहा है खतरा?

नेपाल और चीन की उत्तरी सीमा का बड़ा हिस्सा ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में आता है। सीमा के दूसरी तरफ तिब्बती पठार है, जबकि नेपाल की ओर पहाड़ी ढलानों पर गांव, सड़कें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और दूसरी महत्वपूर्ण संरचनाएं मौजूद हैं।

ऐसे में तिब्बत की तरफ ग्लेशियल झील टूटने या हिमस्खलन होने पर पानी बेहद तेजी से नेपाल के निचले इलाकों तक पहुंच सकता है। मानसून के दौरान भारी बारिश इस जोखिम को और बढ़ा देती है।

त्रिभुवन विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर सुदीप ठुकरी के मुताबिक, ग्लेशियल झीलों का टूटना और हिमस्खलन नेपाल-तिब्बत सीमा के लिए मौसमी और भौगोलिक खतरे हैं। उनका कहना है कि ऊंचाई वाले इलाकों में ऐसी घटनाएं प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन जब बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे आता है तो इसका असर बेहद विनाशकारी हो सकता है।

पहले भी कई बार हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं

नेपाल के लिए यह खतरा नया नहीं है। पिछले साल रसुवा क्षेत्र में भी बड़ी बाढ़ आई थी। उस समय किए गए अध्ययनों में लेंदे खोला के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में ग्लेशियल झील के फटने को संभावित कारण माना गया था। बाढ़ अपने साथ पत्थर, मिट्टी और रेत बहाकर लाई थी, जिससे सड़क, पुल, बिजली परियोजनाओं और आबादी वाले इलाकों को भारी नुकसान हुआ था।

साल 2024 में सोलुखुम्बु जिले के थामे इलाके में भी अचानक आई बाढ़ ने कई घरों को नुकसान पहुंचाया था। वहीं 2016 में कोदारी और तातोपानी क्षेत्र में आई बाढ़ ने अरनिको राजमार्ग और ऊपरी भोटेकोशी जलविद्युत परियोजना समेत कई महत्वपूर्ण ढांचों को प्रभावित किया था।

इस बार की घटना क्यों खास है?

विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालयी इलाकों में छोटी-बड़ी ग्लेशियल और हिमस्खलन संबंधी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन बुधवार को आई बाढ़ का स्तर असाधारण बताया जा रहा है। स्थानीय बुजुर्गों ने भी ऐसी भयावह बाढ़ पहले कभी नहीं देखे जाने की बात कही है।

फिलहाल यह साफ नहीं है कि बुधवार की बाढ़ ग्लेशियल झील फटने, हिमस्खलन, भारी बारिश या इन सभी परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव का नतीजा थी। वैज्ञानिक और अधिकारी सैटेलाइट डेटा और अन्य सूचनाओं के आधार पर इसकी असली वजह पता लगाने में जुटे हैं।

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